Monday, 13 July 2015

मुग्धा , तुम्हारे चीड-बन से /लक्ष्य “अंदाज़”




मुग्धा तुम्हारे चीड-बन से 
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(लक्ष्य “अंदाज़”)


तुम्हें तो याद ही होगा 

(
1) इस साल ...
अमलतास के शहर की हवाओं को
अपने दामन में बाँध कर
जब रोप आई थी तुम खुद को
उसी चीड-बनमें
तेज़ी से रिसती जा रही
उम्र की हरी झील के किनारे
तुम्हारी धुआं-धुआं आँखों में
छाने लगे थे जब
गुजरते बरसों के बेरहम कोहरे
याद तो होगा ना तुम्हें ,

(
2) बीते साल ...
जब उसी झील के किनारे
एक दूसरे का हाथ
कस कर थामे
हम देखते रहे पहरों
पानी में लरजती परछाईयों को
बाँट रहे थे सजाओं की तरह
आने वाले कल की तन्हाइयों को
याद तो होगा ना तुम्हें ,

(
3) पार साल ....
मध्य युगीन नायिका को
बिछड़े सामंत की तलाश
जंगल के उस छोर तक ले आई
और प्रेम की स्प्रिचुअलिटी
देह की बायो-ज्योग्राफीसे जा टकराई
एक घने बन-महुवाके पीछे
बरसते पानी के बीच
धधकती साँसों के बीच
प्यार किया था मैंने तुम्हें ,

(
4) और पार परसाल...
तुम खुद पहाड़ की बारिश सी
बरसी थीं , कई बार
रेतीले कैक्टस पर मूसलाधार
मैंने भरता रहा
अपनी जलग्रन्थियों में
बूंद दर बूंद , तुम्हारे
प्यार की हर फुहार
मेरे कंटीले अंतस से
फूट पड़े चटख रंगों के फूल
उस सावन , कई बार ,


(
5) मगर इस साल मित्ती

तुम मिट्टी के उस पहाड़ में
चीड के घने झुरमुट की आड़ में
रोप आई हो खुद को
तो मैं बस तुम्हें ये बताने आया हूँ
चीड-बनकी इस पहाड़ी में
कभी पानी नहीं होगा
यहाँ सदा औरों के हिस्से का
आवारा बादल ही बरसता है
और अपनी सघन हरी डालियों पर
इठलाता चीड
उम्र भर एक फूल के लिए तरसता है !!

(लक्ष्य “अंदाज़”)

……©2014DR. L.K .SHARMA



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