Monday, 13 July 2015

कैसे तेरा हिज्र लिखूं /लक्ष्य “अंदाज़”




                   कैसे तेरा हिज्र लिखूं
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                               (लक्ष्य अंदाज़”)

शहरे वफ़ा की फिजाओं का रंगीन सलाम लिखूं  II
आजा कि इन हवाओं पर तेरा रेशमी नाम लिखूं II

तेरी मुहब्बतों में डूबकर शहरों शहर भटका मगर ,
इक रात नशे की ऐसी दे मैं आँखों के जाम लिखूं II

यहाँ बदलियों के आइने तेरी मुसलसल तस्वीरें हैं ,
मैं आसमां में उड गया इन्हें चूम लूँ पयाम लिखूं  II

जंगलों की बारिशों में भीग कर मैं ये ही सोचता ,
तेरे लबों की नमी को सहर लिखूं या शाम लिखूं II

तुझे ज़र्फ़ पे यकीन है मुझे हादिसों का खौफ है ,
तेरे मिलने की इबादतें किस खुदा के नाम लिखूं  II

तेरे शहर के इक अदीब ने कई बार मुझे ये कहा ,
तुझे भूलकर जिंदा रहूँ तुझे याद कर कलाम लिखूं II

ये कहानियों सी बात है तू आज तक मेरे साथ है ,
मैं कैसे तेरा हिज्र लिखूं मैं कैसे वफ़ा नाकाम लिखूं   II

©2015 “ANDAZ-E-BYAAN”  Dr.LK SHARMA




2 comments:

  1. कैसे तुझे लिखू तेरी बाहों का वो मंजर लिखी जो डीग महल मे छोड़ आये हम ! फिर मिलने को लिए

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  2. कैसे तुझे लिखू तेरी बाहों का वो मंजर लिखी जो डीग महल मे छोड़ आये हम ! फिर मिलने को लिए

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